रबर कितने प्रकार का होता है? पहले आंकड़े समझिए
रबर दो तरह का होता है: नैचुरल रबर (पेड़ों से) और सिंथेटिक रबर (पेट्रोलियम से)। दुनिया भर में हर साल करीब 30 मिलियन टन रबर खपत होता है, जिसमें लगभग 47% नैचुरल और 53% सिंथेटिक है। भारत सालाना करीब 8.5 लाख टन नैचुरल रबर पैदा करता है, जिसका 75% हिस्सा अकेले केरल देता है। इतना उत्पादन होने के बावजूद बढ़ती मांग की वजह से भारत नैचुरल रबर का शुद्ध आयातक बना हुआ है, जबकि दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक थाईलैंड है (लगभग 35% हिस्सेदारी, सालाना 4.5 मिलियन टन से ज़्यादा)।
नैचुरल रबर कैसे बनता है: पेड़ की छाल से लेटेक्स तक
नैचुरल रबर की शुरुआत Hevea brasiliensis यानी रबर के पेड़ से होती है। यह पेड़ लगाने के 5-7 साल बाद तैयार होता है और फिर 25-30 साल तक लेटेक्स देता है। यहीं से शुरू होती है रबर बनने की प्रक्रिया:
- टैपिंग: सुबह 5-7 बजे पेड़ की छाल पर करीब 30 डिग्री के कोण पर कट लगाया जाता है। सफेद दूध जैसा लेटेक्स रिसकर कट में लगे कप में जमा होता है। एक पेड़ को 2-3 दिन के अंतर पर ही टैप किया जाता है, रोज़ कट लगाया तो पेड़ नष्ट हो जाएगा।
- संग्रह और गुणवत्ता: कच्चे लेटेक्स में केवल 30-35% असली रबर (Dry Rubber Content) होता है, बाकी पानी, प्रोटीन और अन्य तत्व हैं।
- उपज: भारत में एक हेक्टेयर (करीब 350-400 पेड़) से सालाना औसतन 1,200-1,600 किलो रबर निकलता है, जबकि अच्छी देखभाल वाले बगीचों में यह 2,000 किलो तक पहुंच जाता है।
लेटेक्स से रबर शीट बनने तक: फैक्ट्री में क्या होता है?
किसान से लेटेक्स खरीदने के बाद प्रोसेसिंग यूनिट में काम शुरू होता है। असल में यही वह चरण है जहां rubber kaise banta hai इस सवाल का व्यावहारिक जवाब मिलता है:
- कोएगुलेशन (जमाना): लेटेक्स में फॉर्मिक एसिड या सिरका मिलाया जाता है, जिससे 8-12 घंटे में वह जमकर पनीर जैसा ठोस द्रव्य बन जाता है।
- रोलिंग: जमे रबर को रोलर मशीन से दो-तीन बार निकालकर लगभग 3 मिमी मोटी शीट बनाई जाती है – इसीलिए इसका नाम Ribbed Smoked Sheet (RSS) है।
- सुखाना: शीटों को धुएँ वाले चैंबर में 40-60 डिग्री सेल्सियस पर 4-7 दिन रखा जाता है। धुआँ नमी और फंगस दोनों से बचाता है।
- ग्रेडिंग: शीट की सफाई और दाग-धब्बों के आधार पर RSS-1 (सर्वोत्तम) से RSS-5 तक ग्रेड मिलते हैं। भारत में कोट्टायम मार्केट की RSS-4 कीमत ही बेंचमार्क मानी जाती है, जो 2024-25 में मोटे तौर पर ₹180-200 प्रति किलो रही – हालांकि मांग और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से यह घटती-बढ़ती रहती है।
टिप: रबर खरीदते समय ग्रेड ज़रूर पूछें। एक ग्रेड के अंतर से कीमत में ₹10-15 प्रति किलो तक का फर्क आ जाता है।
सभी उत्पादों के लिए शीट नहीं बनती। दस्ताने जैसी चीज़ों के लिए कंसंट्रेटेड लेटेक्स (लगभग 60% DRC) इस्तेमाल होता है, जबकि टायर इंडस्ट्री ज़्यादातर ब्लॉक रबर (भारत में ISNR) खरीदती है।
सिंथेटिक रबर कैसे बनाया जाता है? पेट्रोलियम से पॉलीमर तक
सिंथेटिक रबर की कहानी तेलशाहियों से शुरू होती है। कच्चे तेल से मिलने वाले नैफ्था को क्रैक करके ब्यूटाडाइन और स्टाइरीन जैसे मोनोमर निकाले जाते हैं। इन मोनोमर्स को पॉलीमराइजेशन �
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