1. मजदूरी का फर्क: $2.64 बनाम $20.67 प्रति घंटा
2019 का आंकड़ा देखिए। चीन में फैक्ट्री मजदूर की लागत प्रति घंटा $2.64 थी। अमेरिका में वही काम $20.67 में होता था। यानी करीब 8 गुना अंतर। जब आप किसी प्रोडक्ट की यूनिट लागत निकालते हैं, तो मजदूरी का ये फर्क सीधे कीमत में दिखता है।
मेरे अनुभव में एक बात और जरूरी है। सस्ती मजदूरी अब शेंज़ें जैसे बड़े शहरों में नहीं मिलती, वहां रेट काफी बढ़ चुके हैं। असली फायदा हूनान, हेनान जैसे आंतरिक प्रांतों की फैक्ट्रियों में है। लेकिन वहां सप्लायर ढूंढना और क्वालिटी कंट्रोल करना मुश्किल है। कम मजदूरी वाली फैक्ट्री में कभी-कभी वर्कमैनशिप की कमी भी साफ दिखती है।
2. स्केल का खेल: बड़ी फैक्ट्रियां, कम यूनिट कॉस्ट
चीन में एक ही फैक्ट्री दुनिया भर के ऑर्डर पूरे करती है। इसे इकोनॉमी ऑफ स्केल कहते हैं। मान लीजिए आपके प्रोडक्ट का मोल्ड बनवाने में 1.5 लाख रुपये लगते हैं। अगर वही मोल्ड 10 लाख पीस पर बंट जाए, तो प्रति पीस खर्च न के बराबर रह जाता है।
शेंज़ें इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए और यीवू छोटे सामान के लिए पूरे क्लस्टर बन चुके हैं। एक इमारत में पैकेजिंग, दूसरी में कॉम्पोनेंट, तीसरी में असेंबली। मैंने खुद देखा है कि एक मार्केट में आधे दिन में पूरा सप्लायर चेन तैयार हो जाता है।
इसकी एक कीमत भी है। बड़ी फैक्ट्रियां MOQ यानी न्यूनतम ऑर्डर मात्रा ज़्यादा मांगती हैं, अक्सर 500 से 1000 पीस। छोटे बायर्स को यही सबसे बड़ी दिक्कत लगती है।
3. सरकारी सपोर्ट: टैक्स रिबेट और सब्सिडी
चीनी सरकार ने दशकों तक मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित किया। निर्यातकों को VAT रिबेट मिला, जिससे एक्सपोर्ट कीमतें घटीं। शेंज़ें जैसे विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाए गए, जहां टैक्स छूट और सस्ती जमीन मिली। इन सब कर सुधारों का फायदा आखिर में खरीदार तक पहुंचता है।
यहां एक चेतावनी भी रखें। नीतियां बदलती रहती हैं और कुछ सप्लायर सिर्फ सब्सिडी के सहारे चलते हैं। नीति बदलते ही ऐसी फैक्ट्रियां बंद हो जाती हैं या क्वालिटी गिरा देती हैं। इसलिए सिर्फ दाम नहीं, स
Leave a Reply